मैंनें आंखें दान कर दी.. No ratings yet.

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टिरन टिरन…. मई की दोपहर के सन्नाटे को तोड़ती एकाएक घर की घण्टी बज उठी। घर में सभी लोग कूलर की तेज आवाज की बीच सो रहे थे। जी हां, इलाहाबाद में मई की दोपहर में सोने का आनन्द ही कुछ और था। कालेज की छुटटी थी इसीलिए मै अपने छात्नावास से घर रहने के लिए आ गया था। पिछले कई दिनों से मुङो दोपहर में अच्छी नींद नहीं आ रही थी। इसका कारण ये था कि मुङो इंतजार रहता था किसी के आने का। कमरे में सो रहे मेरे दोनों भाइयों के बीच से मैं बेहद सम्हलकर उठा और दरवाजे की ओर बढ़ चला। उम्मीद थी कि मुङो जिस चीज का इंतजार है, शायद वही होगी। दरवाजा खोलते ही सांय से लू के थपेड़े मेरे चेहरे पर पड़े। आंख मीचकर मैंने दरवाजे की ओर देखा तो डाकिया सफेद गमछे से पूरा मुंह ढ़के खड़ा था। मुङो देखते ही बोल पड़ा… भैया रजिस्टरी ले लो। मैने सोचा….रजिस्टरी…. पापा गांव से या तो चिट्ठी लिखते हैं या फिर मनीआर्डर से पैसे भेजते हैं। उन दिनों किसी परीक्षा का एडमिट कार्ड भी नहीं आना था कि वह भी रजिस्टरी से आता। मुङो थोड़ा अटपटा लगा लेकिन, अचानक ध्यान आया कि कहीं मेरे लिए हैदराबाद से तो कुछ नहीं आ गया। पोस्टमैन से लेकर मैंने लिफाफे पर नजर डाली तो उस पर हैदराबाद का ही पता लिखा था। लू के थपेड़ों से अबतक मैं सिकुड़ा हुआ था, लेकिन, अचानक मुझमें तेजी आ गयी। मैं लिफाफा खोलकर देखने लगा। इसी बीच डाकिये ने कहा कि अरे भैया.. पहले हियां साइन कै देव, फिर देखत रहना कि एह मां का है। मैंने झट से उसकी हथेली पर रखे कागज पर ही साइन किया और लिफाफा लेकर अंदर कमरे में आ गया। कमरे में सभी सो रहे थे इसलिए मैं वहां न तो बत्ती जला सकता था और ना ही लाईट… इसीलिए मैं बालकनी में बैठ गया। झट से लिफाफा खोला। मुङो उम्मीद नहीं थी कि उम्मीद से इतना ज्यादा मिल जायेगा। लिफाफे के भीतर से कई आइटम निकल.. आई डोनेशन के छ: कार्ड और एक दर्जन आई डोनेशन को बढ़ावा देने वाले पोस्टर। मुङो सबसे ज्यादा खुशी आई डोनेशन वाले कार्ड को देखकर हुई। मैनें एक महीने पहले ही हैदराबाद स्थित आई बैंक एसोसिएशन आफ इंडिया से अपनी आंखें दान करने की गुजारिश की थी। इस प्रेरणा के पीछे भी अजीब कहानी है। घर वाले टीवी देख रहे थे। इसी बीच मैं भी छात्नावास की मेस बंद होने के कारण घर पर ही खाना खाने के लिए आ गया। खाना खाते समय टीवी पर आई बैंक का प्रचार आ रहा था जिसमें ऐश्वर्या राय सबसे अपील कर रही थी कि उन्हें उन्हीं की तरह आंखें दान करनी चाहिए। मेरे भाई साहब ने प्रचार देखकर कहा कि ऐसा करने से थोड़ी न कुछ होता है, कि किसी के कहने पर ही कोई अपनी आंखें दान कर दे….मैंने इसका विरोध किया। अपने इसी विरोध को सही साबित करने के लिए मैंने आई बैंक को चिट्ठी लिखी थी। तब चिट्ठी लिखना कम नहीं था। मैने एक फिल्म देखने के पैसे चिट्ठी पर खर्च कर दिये। आखिरकार वैसा ही हुआ जैसा मेरा विश्वास था। मैंने शाम को सबको दिखाया कि किस तरह मेरी एक चिटठी पर हैदराबाद से जवाब और बड़ा सा लिफाफा आया है।
छुटटी खत्म हुई और मैं फिर से अपने हॉस्टल आ गया। कमरे में आते ही मैंने सबसे पहले एक काम किया। मैंने नेत्नदान के लिए प्रेरित करने वाले पोस्टरो को अपने हास्टल के कमरे के बाहर और कामन हाल में लगा दिया। इसके बाद अपने लिए एक आई डोनेशन का फार्म भरा और उसे बड़ी हिफाजत से अपने पर्स में रख लिया। मुङो ये बात समझ आ गयी थी कि यदि इस तरह के बारे में कोई बताने समझाने वाला हों तो बहुत लोग इससे जुड़ सकते हैं। अच्छा काम करने वाले बहुत हैं पर उनमें एक कमी ये होती है कि वे थोड़े से आलसी होते हैं और नेत्नदान जैसे कार्यक्र मों के लिए तो चाहकर भी समय नहीं निकाल पाते। अरे कौन पता करता फिरे कि कहां क्या होता है। इसी को ध्यान में रखकर मैंने अपने कमरे और कामन हाल के बाहर पोस्टर लगाये थे। अगले दिन सुबह इसका असर दिखने लगा। सबसे पहले नजर पड़ी राम सिंह की… क्या मनीष भाई इब इंजीनीयरिंग की जगह सामाजिक कार्यकर्ता बन गये क्या? पोस्टर के साथ गांधी छाप झोला भी लाये होगे। तैयारी से मन उब गा का बे? …..कहके राम सिंह आगे चाय की दुकान की ओर बढ़ चले। मैं भी जब चाय पीने गया तब मुङो पता चला कि किसी को कुछ बताने समझाने से कितना फर्क पड़ता है। मैंने जितना समझा उतनी बात अपने दोस्तों को समझायी। उनमें से कई नेत्नदान के बारे में जानते तो थे लेकिन, नेत्नदान से जुड़ी कार्यवाही कौन करे। ऐसे लोगों के लिए मै जरिया बन गया। जितने भी लड़के मेरे कमरे की तरफ आये, सभी नेत्नदान के इच्छुक थे। मैंने सभी को एक आई डोनेशन कार्ड किया। इतने से ही तीन सौ छात्नों के छात्नावास में नेत्नदान पर चर्चा शुरू हो गयी थी।
इलाहाबाद से पढ़ाई खत्म हो गयी तो नौकरी में आ गये। अभी भी पुराने दोस्त मिलते हैं तो इसकी चर्चा शुरू हो जाती है कि और कितने लोगों ने इस दिशा में काम किया। मेरा नेत्नदान को बढ़ावा देने का काम नौकरी में आने के बाद थम सा गया। लेकिन इसे नयी जान मिली आगरा में जब मेरी शादी होने के बाद पत्नी घर में आयी। अक्सर हमलोग अांखों पर पटटी बांधकर रोजाना के घरेलू कार्यो में से एक काम को करने की कोशिश करते। सप्ताह में एक दिन जरूर। इस अभ्यास से हम दोनों लोगों को यह समझने में बेहद कामयाबी मिली है कि रौशनी क्या है और रौशनी के बिना क्या है। खैर आगरा में मेरे नये मित्न बने अखिल जो एक संस्था चलाते हैं जिसका काम नेत्नहीनों को आत्मनिर्भर बनाना है। मैंने पहले तो संकोच किया क्योंकि एनजीओ के साथ जुड़ने से बदनामी का डर था। बाद में पता चला कि अखिल की चाल अलग है। निकटता बढ़ी और आगरा में एक बार फिर से मैं इस काम से जुड़ गया। बाद में हस्तानान्तरण होकर देहराूदन आ गया। यहां इस काम को और मजबूती मिली। हमने स्कूली छात्न-छात्नाओं के बीच कई कार्यक्र म किये। लोगों में जागरूकता के साथ – साथ जो सबसे जरूरी काम समझ आता है वह नेत्नदान से जुड़े ढ़ाचे को तैयार करना। यदि कार्निया कलेक्शन सेन्टर एक शहर में 10 भी हों तो बड़ा फर्क आ सकता है।

मनीष कुमार / देहरादून / ब्यूरोचीफ, ई.टी.वी., उत्तराखण्ड

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