यदि एक लाख नेत्रहीनों में ट्रांसप्‍लांट करने है तो कम से कम दो लाख कॉर्निया का दान करवाना होगा No ratings yet.

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डा. राधिका टंडन, ऑफिस इनचार्ज, नेशनल आई बैंक, एम्‍स, नई दिल्‍ली से दिव्‍या साहू की बातचीत

आप भारत में नेत्रदान की स्थिति को किस तरह से देखती हैं?

भारत में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस की समस्‍या काफी बड़ी है। नेत्रदान करवाकर दृष्टिहीनों की रौशनी वापस आ सकती है। नेत्रदान के दौरान मृत व्‍यक्ति की आंख से कॉर्निया निकालकर नेत्रहीन की आंख में प्रत्‍यारोपित किया जाता है। इस ऑपरेशन में करीब 50 प्रतिशत सफलता मिल पाती है। मतलब कि यदि एक लाख नेत्रहीनों में ट्रांसप्‍लांट करने है तो कम से कम दो लाख कॉर्निया का दान करवाना होगा। पिछले साल तकरीबन 50 हज़ार कॉर्निया डोनेट हुए हैं और पूरे भारत में करीब 20 हज़ार ऑपरेशन हुए हैं। नेत्रहीनों की लंबी कतार के सामने यह आंकड़ा बेहद कम है। कॉर्निया की कमी है। ऐसे में कई नेत्रहीनों को पूरी जिंदगी इंतजार में ही बीत जाती है।

जब भारत में नेत्रदान की इतनी ज़रूरत है तो क्या वजह है कि लोग नेत्रदान के लिए आगे नहीं आते हैं?

इसके कई कारण हैं। लोगों में भ्रम है कि नेत्रदान हुआ तो मृतक का चेहरा ख़राब हो जाएगा और देखने में भयानक लगेगा। कुछ अन्‍य लोग मानते है कि मृत्यु के बाद शरीर से आंखें निकाल ली गई तो अगले जन्म में अंधे पैदा होंगे। दरअसल लोगों को समझाने की जरूरत है कि नेत्रदान मृत्यु के बाद होता है और उस वक्‍त शरीर जिंदा नहीं रहता है। वैसे ये एक ऑपरेशन बेहद बारीक होते है और पलक बंद रहती है। मृतक की आंख नहीं,बल्कि सिर्फ़ कॉर्निया निकाला जाता है। पलक बंद होने पर नेत्रदान का पता भी नहीं चलता है। कई छोटे शहरों में लोगों को पता नहीं होता है कि नेत्रदान के लिए कहां संपर्क करना है। आप नज़दीकी आई बैंक या नज़दीकी हॉस्पिटल से वो संपर्क कर नेत्रदान का कार्य पूरा करा सकते हैं।

किस क्षेत्र में अधिक काम की जरूरत हैताकि लोग नेत्रदान करने आगे आएं?

हमें लगातार नेत्रदान से जुड़ी जानकारी के प्रचार की कोशिश करनी चाहिए। कुछ कारगर सरकारी प्रयास भी होने चाहिए। उदाहरण के तौर पर जमैका और इंग्लैंड में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते समय पूछा जाता है, कि ‘आप नेत्रदान करना चाहते हैं या नहीं?’ जब विदेशों में यह प्रयास कारगर साबित हुआ तो भारत में भी लागू किया जाना चाहिए।

इस वक्‍त आधार कार्ड बनाने का काम तेजी से चल रहा है। इस तरह के हर सरकारी कार्ड बनने की प्रक्रिया में नेत्रदान के सवाल को रखना चाहिए। स्कूल और सामाजिक बैठकों में भी इसका प्रचार हो सकता है। टीवी, रेडियो और अख़बारों के माध्यम से भी प्रयास हो रहे हैं। हॉस्पिटल ख़ुद कॉर्निया प्रोग्राम को सपोर्ट दे सकते हैं। मरीज की मौत के बाद कागजी कार्रवाई में परिवार से पूछा जा सकता है कि क्‍या वे मृतक का नेत्रदान करना चाहते हैं?

भारत में नेत्रदान के लिए ज़रूरी नहीं है की मृत्‍यु से पहले कार्ड साइन किया हो। क़रीबी रिश्तेदार भी डेथ के बाद फॉर्म साइन कर सकते हैं। लोग अपने नज़दीकी रिश्तेदारों को बता सकते हैं कि दुनिया से उनके जाने के बाद नेत्रदान की इच्‍छा पूरी हो। इस कदम से भी बहुत मदद मिल सकती है।

आखिर कैसे युवाओं को भी नेत्रदान से जोड़ा जा सकता हैइसमें सोशल नेटवर्किंग साइट्स की क्‍या भूमिका होगी?

हां, हमारे युवा बहुत प्रतिभावान हैं और उनके पास बेहतरीन सुझाव रहते हैं। हम युवाओं को कह सकते हैं कि वे अपनी तरफ़ से नेत्रदान अभियान में किसी भी तरह का योगदान कर सकते हैं। इन सुझावों में कोई स्लोगन, गाना, कविता, ई पोस्टर भी हो सकता है। नेत्रदान के सहयोग के लिए युवा कुछ स्लोगन या कोई छोटा सा विज्ञापन बनाकर हम लोगों को भेज सकते हैं। ताकि हम इन चीजों को कैंपेन में इस्तेमाल कर सकें। रूटीन मानकर अपने सोशल नेटवर्किंग साइट पर सूचना प्रसारित कर सकते हैं, ‘बी एन आई डोनर’। इसके लिए उन्हें कहीं से कोई फॉर्म साइन करने की ऐसी ज़रूरत नहीं है। केवल अपने रिश्तेदारों को बता सकते हैं। वो अपने फेसबुक पर भी डाल सकते हैं कि ‘मैंने अपने परिवार वालों को बता दिया है कि मैं आई डोनर बनना चाहता हूं और मुझे उम्मीद है की वो मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करेंगे।’ ऐसा करने से समाज में जबरदस्‍त सकारात्‍मक प्रभाव पड़ेगा।

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