दृष्टिहीनों के लिए वरदान बनेगी ‘स्मार्ट केन’ No ratings yet.

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दृष्टिहीन लोगों के लिए वाइट केन (सफेद छड़ी) चलने का सहारा है। आजादी एवं सुरक्षा की प्रतीक है सफेद छड़ी। इससे सामने नीचे की तरफ के अवरोध व गड्ढों का पता चल जाता है। लेकिन बड़ी समस्या तब आती है जब रास्ते में घुटने से ऊपर सिर तक के अवरोध होते हैं। फुटपाथ पर होर्डिंग, बोर्ड और दीवारों से निकले एयरकंडीशनर,पेड़ की डालियां लटकी होती हैं। नेत्नहीनों को अक्सर इससे चोट लगती है। अब यह परेशानी ‘स्मार्ट केन’ खत्म कर देगा। आईआईटी, दिल्ली की एक टीम ने ऐसा गैजेट तैयार किया है, जो सामने के अवरोधों के बारे में पहले ही सिग्नल दे देगा। फिलहाल इसका सफल ट्रायल चल रहा है। जल्द ही चेन्नई की एक कंपनी ‘स्मार्ट केन’ को बाजार में उतारेगी।

आईआईटी दिल्ली के प्रो. एम बालाकृष्णन से बातचीत के आधार पर नई दिल्ली से दिव्या साहू की रिर्पोट 

क्या है स्मार्ट केन, कैसे काम करती है?
आईआईटी दिल्ली के प्रो. एम बालाकृष्णन बताते हैं कि वाइट केन के ऊपरी हिस्से में एक खास गैजेट लगाया जाता है। यह अल्ट्रासोनिक रेजर है। इसमें एक ट्रांसमीटर और एक रिसीवर होता है। ट्रांसमीटर से लगातार अल्ट्रासोनिक किरणों निकलती रहती हैं। यदि सामने कोई भी अवरोध होगा तो अल्ट्रासोनिक किरणों टकराकर स्मार्ट केन के रिसीवर तक पहुंचेंगी। इससे पता चल जाएगा कि सामने कितनी दूरी और ऊंचाई पर अवरोध है। यह सब दृष्टिहीन व्यक्ति के चलने की गति की गणना कर स्मार्ट केन बताता है।
स्मार्ट केन से कितनी दूरी तक के अवरोध का पता चल सकेगा?
स्मार्ट केन में दो मोड है। एक घर के अंदर के लिए और दूसरा बाहर के लिए। घर में दो मीटर तक चलने के लिए बनाया गया है। जबकि बाहर तीन मीटर तक के अवरोधों के बारे में स्मार्ट केन चेतावनी देगा।
जिस तरह कॉल आने पर आपका फोन वाइब्रेट करता है, वैसे ही स्मार्ट केन के सामने अवरोध आने पर यह भी वाइब्रेट करने लगेगा। खास बात है कि इससे दूरी का स्पष्ट पता चल जाएगा। मोबाइल की तरह ही इसमें बैट्री होगी और एक बार चार्ज करने के बाद यह करीब दस घंटे तक चलेगा। दृष्टिहीन लोग औसतन प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे चलते हैं। स्मार्ट केन को सप्ताह में एक बार चार्ज करने से ही काम चल जाएगा।
स्मार्ट केन के इस्तेमाल करने के लिए पांच भाषा इंग्लिश, हिन्दी, पंजाबी, तमिल और गुजराती में ऑडियो व ब्रेल मैनुअल भी बनाए गए हैं। यह सुनकर और पढ़कर दृष्टिहीन लोग खुद भी प्रयोग सीख सकते हैं।

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[stextbox id=”info” caption=”विश्व सफेद छड़ी सुरक्षा दिवस (15 अक्टूबर 2013)” float=”true” align=”right” width=”300″]साधारणतया हमलोग किसी व्यक्ति को सफेद छड़ी के साथ देखते हैं, तो बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते है, जबकि यह छड़ी दृष्टिहीन व्यक्ति को आजादी के साथ चलने फिरने में मदद करती है। हम लोगों के लिए ये महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि हम किसी व्यक्ति को सफेद छड़ी के साथ देखें तो पर्याप्त सावधानी बरतें ताकि वो आसानी से चलफिर सके। दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ कर आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है, कि इन्हें एक ऐसा माहौल प्रदान किया जाये जिसमें न सिर्फ सम्मान के साथ बराबरी का अधिकार बल्कि स्वच्छंदतापूर्व गतिशीलता भी हो। दृष्टिहीन लोगों को अन्य दिक्कतों के अलावा सबसे ज्यादा समस्या स्वच्छंदतापूवर्क चलने फिरने में आती है सफेद छड़ी दृष्टिहीनों की गतिशीलता को बनाये रखने में महत्वपूर्ण हो जाती है। कई शताब्दियों तक सफेद छड़ी सिर्फ यात्ना के दौरान सहायता प्रदान करने वाले माध्यम के रूप में ही देखी जाती रही है, लेकिन बीसवीं शताब्दी सें इसे न सिर्फ दृष्टिहीनों के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा बल्कि सामान्य लोगों को दृष्टिहीनों की उपस्थिति का एहसास कराने पर भी जोर दिया जाने लगा।
15 अक्टूबर 1970 को पहली बार विश्व दृष्टिहीन संघ के अध्यक्ष ने 15 अक्टूबर को विश्व सफेद छड़ी सुरक्षा दिवस घोषित किया। सफेद छड़ी दृष्टिहीनों के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है सफेद छड़ी न सिर्फउनको चलने में मदद करती है, बल्कि हमारे समाज में दृष्टिहीनों की पहचान बनाती है। ये उनकी स्वच्छंदता का भी प्रतीक है।
सफेद छड़ी दिवस को मनाने का मुख्य उदेश्य ही लोगों में दृष्टिहीनों के प्रति जागरूकता पैदा करना और उन्हें इस बात के लिए प्रेरित करना कि जब भी वो किसी व्यक्ति को सफेद छड़ी के साथ सड़क पर चलते हुए या सड़क पार करते हुए देखे तो और अधिक सावधानी बरते।[/stextbox]
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स्मार्ट केन की कीमत?
इस गैजेट की दो तरह की कीमत हैं। मार्केट में यह ढ़ाई से तीन हजार के करीब मिलेगा। इसके साथ-साथ पांच सौ रु पए प्रशिक्षण के लिए खर्च करने होंगे।
दृष्टिहीन लोग अक्सर बेहद कम आर्थिक क्षमता के होते हैं, उन्हें यह गैजेट कैस मुहैया होगा?
केंद्र सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस के पास एक योजना है, जिसके तहत विकलांग जनों को छह हजार रु पए तक के उपकरण पर सब्सिडी दी जाती है। इस संबंध में आईआईटी, दिल्ली की टीम की दिल्ली डिसेबिलिटी कमिश्नर से बात भी हुई है। उन्होंने आईआईटी के लैब में आकर हमारी योजना विस्तार से देखा। उन्होंने सकारात्मक रु ख दिखाकर प्लान मांगा है। आईआईटी दिल्ली के प्रो. एम बालाकृष्णन ने बताया कि कुछ ही दिनों में राज्यों के डिसेबिलिटी कमिश्नर का सम्मेलन होने वाला है। उसमें वह इस गैजेट के बारे में बताएंगे।
प्रो. बालाकृष्णन बताते हैं कि भारतीय तकनीकि उपकरण बाजार में बहुत कम हैं। अगर कोई उपकरण यहां बनता भी है तो तकनीक बाहर की होती है। इसलिए उन्हें बहुत सकारात्मक रेस्पोंस मिल रहा है। इस क्षेत्न में जो भी उपकरण हैं, वे सब बहुत महंगे हैं। उनकी कीमत कम से कम चालीस-पचास हजार रु पए है। लेकिन हम मात्न ढ़ाई-तीन हजार रु पए की बात कर रहे हैं। ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से भी सकारात्मक संदेश मिले हैं। संभव है कि भारत में लांचिंग के छह-आठ महीने बाद इसका निर्माण करने वाली कंपनी निर्यात भी करेगी।
इसको तैयार होने में कितना वक्त लगा?
यह दो चरण में तैयार हुआ। सबसे पहले स्टूडेंट प्रोजेक्ट बना। छात्नों ने चार वर्जन बनाए। इसमें करीब ढ़ाई साल का वक्त लगा। शुरू में टीम ने आईआईटी के संसाधन से काम किया। लेकिन इसके बाद टीम को रिसर्च फंड और उस कंपनी तलाश थी, जो स्मार्ट केन को निर्माण कर बाजार में उतार सके। निर्माण के लिए चेन्नई की एक कंपनी तैयार हुई।
क्या स्मार्ट केन वाटर प्रूफ है?
यह वाटर प्रूफ है, लेकिन तेज बारिश में यह काम नहीं करेगा। दरअसल, अल्ट्रासोनिक किरणों पानी की बूंदों से भी टकराकर लौटती हैं। ऐसे में स्मार्ट केन गलत सूचना दे सकता है। स्मार्ट केन का डिवाइस वाइट केन के ऊपरी हिस्से में लगा होता है। इसलिए यदि केन टूट भी जाता है, तो दूसरी वाइट केन में इसे लगाया जा सकता है।
किन इलाकों में स्मार्ट केन सफल है?
स्मार्ट केन का परीक्षण दिल्ली, देहरादून और मुम्बई में चल रहा है। बैग्ांलोर और चेन्नई में भी ट्रायल होना है। करीब सवा सौ यूर्जस के साथ ट्रायल किया गया है। शिमला में भी प्रयोग किया गया। इसका प्रयोग मैदानी इलाकों में ही सफल रहा है। पहाड़ी इलाकों में यह सफल नहीं है। शिमला में प्रयोग के दौरान दिक्कतें देखने को मिली। इसलिए फिलहाल पहाड़ी इलाकों के लिए स्मार्ट केन का प्रयोग नहीं किया जा सकेगा। अगले चरण में ऐसा स्मार्ट केन बनाने की कोशिश होगी, जो बता सके कि आगे कितना गहरा गड्ढा है।
भारत में इसका भविष्य
आईआईटी, दिल्ली की टीम को ‘स्मार्ट केन’ का भविष्य काफी बेहतर लग रहा है। प्रो. एम बालाकृष्णन बताते हैं कि ट्रायल स्टेज बेहतर है। आप दृष्टिहीन व्यक्ति के लिए सोचें तो आपको पता चलेगा कि उन्हें कितनी खुशी मिलती है। लेकिन मेरा मानना है कि असली सफलता तभी मिलेगी,जब नेत्नहीन लोग इसका प्रयोग करने लगेंगे।

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